ट्रंप की हठधर्मी

डोनाल्ड ट्रंप की हठधर्मी और ईरान युद्ध का प्रश्न आज वैश्विक राजनीति के सबसे खतरनाक मोड़ों में से एक बनता जा रहा है। जब भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कूटनीति, संवाद और बहुपक्षीय समझौते की जगह व्यक्तिगत अहंकार, आक्रामक राष्ट्रवाद और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाती है, तब युद्ध की आशंका बढ़ जाती है।

ट्रंप की राजनीतिक शैली इसी प्रवृत्ति का एक चरम उदाहरण है, जिसमें जटिल वैश्विक समस्याओं को भी ताकत के प्रदर्शन और एकतरफा निर्णयों के जरिए हल करने की कोशिश की जाती है।

डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति का मूल स्वभाव ही टकराववादी रहा है। “अमेरिका फर्स्ट” के नारे के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, समझौतों और कूटनीतिक संतुलनों को अक्सर महत्वहीन मान लिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2018 में अमेरिका का ईरान परमाणु समझौते से हटना था।

ज्वाइंट काम्प्रेहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) को विश्व की बड़ी शक्तियों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी—ने मिलकर तैयार किया था। इस समझौते का उद्देश्य था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित रखे और इसके बदले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएँ। लेकिन ट्रंप ने इसे “सबसे खराब समझौता” बताते हुए इससे बाहर निकलने का फैसला किया और ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध फिर से लगा दिए।

यहीं से तनाव की नई श्रृंखला शुरू हुई।

ईरान पर आर्थिक नाकेबंदी, उसके सैन्य ठिकानों पर दबाव, और मध्य-पूर्व में लगातार सैन्य उपस्थिति ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। दूसरी ओर इज़राइल और कुछ खाड़ी देशों का समर्थन ट्रंप की नीति को और आक्रामक बनाता रहा। यह गठजोड़ ईरान को क्षेत्रीय संतुलन के लिए सबसे बड़ा खतरा बताता है और उसे कमजोर करने की रणनीति पर काम करता है।

ट्रंप की हठधर्मी का एक पहलू यह भी है कि वे जटिल भू-राजनीतिक संघर्षों को व्यक्तिगत शक्ति-प्रदर्शन के मंच में बदल देते हैं। उदाहरण के लिए, क़ासिम सोलिमनी की 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में हत्या ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था। उस घटना ने दिखा दिया कि एकतरफा सैन्य कार्रवाई किस तरह पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है।

ईरान युद्ध की आशंका इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मध्य-पूर्व केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष का मैदान नहीं है; यह वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र भी है। यहाँ अमेरिका, रूस, चीन, यूरोपीय शक्तियाँ और क्षेत्रीय ताकतें—सभी के हित जुड़े हुए हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ता है, तो उसके प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे। तेल आपूर्ति, वैश्विक अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार मार्ग और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था—सब पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

ट्रंप की नीति की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि वह कूटनीति को कमजोर करती है और संकट को सैन्य टकराव की ओर धकेलती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी शक्ति की विश्वसनीयता केवल उसकी सैन्य क्षमता से नहीं बल्कि उसके समझौतों और प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता से भी बनती है। जब कोई देश एक बहुपक्षीय समझौते से अचानक बाहर निकल जाता है, तो वह केवल विरोधी देश को ही नहीं बल्कि अपने सहयोगियों को भी असहज स्थिति में डाल देता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ट्रंप की आक्रामकता केवल विदेश नीति की रणनीति नहीं, बल्कि उनकी घरेलू राजनीति से भी जुड़ी रहती है। जब घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक दबाव बढ़ता है, तब बाहरी दुश्मन की छवि गढ़ना और राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारना कई नेताओं के लिए एक आसान रास्ता बन जाता है। इस दृष्टि से ईरान के साथ तनाव कभी-कभी अमेरिकी आंतरिक राजनीति का उपकरण भी बन जाता है।

दूसरी ओर, वैश्विक शक्तियों की निष्क्रियता भी इस संकट को बढ़ाती है। रूस और चीन जैसे देश अक्सर केवल बयान देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं, जबकि उनके पास अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की पर्याप्त क्षमता है। यदि वे सक्रिय कूटनीतिक पहल नहीं करते, तो मध्य-पूर्व में युद्ध की आग भड़कने से रोकना कठिन हो जाता है।

अंततः ट्रंप की हठधर्मी और ईरान के साथ बढ़ता टकराव इस बात का संकेत है कि आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहाँ बहुपक्षीय सहयोग की जगह शक्ति-प्रतिस्पर्धा और सामरिक गठबंधनों का वर्चस्व बढ़ रहा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो ईरान युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि व्यापक वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है।

जमीनी स्तर पर इसका सबसे दर्दनाक परिणाम आम नागरिकों की बढ़ती मौतों और विनाश के रूप में सामने आ रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार युद्ध के शुरुआती दिनों में ही ईरान में एक हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी थी और हजारों लोग घायल हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं।

कुछ हमलों में स्कूलों और नागरिक ठिकानों के निशाना बनने की खबरें भी सामने आई हैं। मिनाब शहर के एक स्कूल पर हुए हमले में बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया और इसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया गया।

युद्ध का असर केवल ईरान या इज़राइल तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाएँ हुई हैं। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देशों में हमलों के कारण नागरिक हताहत हुए और महत्वपूर्ण सैन्य तथा आर्थिक ढाँचों को नुकसान पहुँचा है।

इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संघर्ष तेजी से एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसका असर पूरे मध्य-पूर्व की स्थिरता पर पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस युद्ध को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है। कई यूरोपीय देशों ने चेतावनी दी है कि इस संघर्ष को समाप्त करने की कोई स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं दे रही है और यदि यह लंबा खिंचता है तो इससे वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इस युद्ध के प्रभाव से हिलने लगी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट और महंगाई की आशंका बढ़ गई है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे दुखद तथ्य यह है कि युद्ध का असली बोझ आम नागरिकों पर पड़ता है—वे लोग जिनका किसी भी भू-राजनीतिक रणनीति या सामरिक निर्णय से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। शहरों के ढहते घर, अस्पतालों में भरे घायल लोग, और अपने प्रियजनों को खो चुके परिवार—ये सब इस युद्ध की असली तस्वीर हैं।

इस प्रकार युद्ध का ग्यारहवां दिन यह दिखाता है कि शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति किस तरह मानवता को विनाश के कगार पर ले आती है। यदि कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता नहीं दी गई और महाशक्तियाँ केवल सामरिक प्रभुत्व की होड़ में उलझी रहीं, तो यह संघर्ष केवल ईरान या मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक अस्थिरता का एक नया अध्याय बन सकता है।

इतिहास हमें बार-बार यही सिखाता है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, पर उसे रोकना और उसके घावों को भरना सबसे कठिन कार्य होता है।

यही कारण है कि दुनिया के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता आज युद्ध नहीं, बल्कि कूटनीतिक विवेक और संवाद की है। क्योंकि इतिहास बार-बार यह दिखाता है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे नियंत्रित करना लगभग असंभव।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकलिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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